Saturday, August 15, 2009

स्त्री

सीने में सागर की लहरें
आँखों में ममता होगी
इस जग के कितने हों पहरे
फिर भी वह ज़िंदा होगी ।

अंतर में भविष्य
मन में अतीत
और आँखों में वर्तमान...

प्रेम की हर बूंद
संजो सीप-से मन में
इंतज़ार करती ख़ामोश
उसके मोती बनने का ।

तन सृजन सामर्थ्य लिए
मन प्रेम काव्य कहे
और कहते हो तुम कि कमज़ोर है यह?

सीता-सी हर पल
अग्निपरीक्षा देती,
या राधा बन
वियोग-पीड़ा सहती,
कच्चा घड़ा ले हीर बन
कहीं गहराइयों में डूबती,
पुरुषों के जग में
ख़ामोशी की ताकत लिए,
चुपचाप, हर कदम
मन में जूझने की हिम्मत लिए
वो अकेली
अंधेरों से लड़े जा रही है ।

मौत देने की क्षमता
को ताकत समझने वालो,
देखो,
इस अंधियारे जग में
हर अमावस को दिवाली बना रही है ।

आज भी चुपचाप
वह एक नया भविष्य जने जा रही है ।

कहो कब, कहाँ, कैसे, क्यों कमज़ोर है यह?

कितनी बार
अत्याचारी,
बलात्कारी बन
दबाया था इसे?

फिर भी यह धूल देखो कैसे गगन पर छा रही है ।

1 comment:

रविंद्र रवि said...

सीता-सी हर पल
अग्निपरीक्षा देती,
या राधा बन
वियोग-पीड़ा सहती,

बहुत गहरी बात कही है आपने.